बहराइच में मनरेगा योजना पर संकट: लाखों सक्रिय श्रमिक, काम कर रहे सिर्फ 18 हजार
बहराइच, उत्तर प्रदेश। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) अपने मूल उद्देश्यों से भटकती नजर आ रही है। बहराइच जिले में जहां 5 लाख से अधिक श्रमिक पंजीकृत हैं, वहीं 2.80 लाख जॉबकार्ड धारक सक्रिय रूप से काम की तलाश में हैं। हालांकि, चौंकाने वाली बात यह है कि वर्तमान में इनमें से मात्र 17 से 18 हजार श्रमिक ही गांवों में चल रहे विकास कार्यों में भागीदारी निभा रहे हैं। यह आंकड़ा सक्रिय श्रमिकों का महज 15 प्रतिशत है, जो योजना की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मजदूरों की घटती संख्या के पीछे कई गंभीर कारण बताए जा रहे हैं। जागरण संवाददाता के अनुसार, मनरेगा में मजदूरी कम होने के साथ-साथ ग्राम प्रधानों और सचिवों द्वारा किया जा रहा भ्रष्टाचार एक बड़ी वजह है। श्रमिकों का आरोप है कि काम कराने के बाद भी उन्हें महीनों तक मजदूरी के लिए भटकना पड़ता है। कई बार तो फर्जी मस्टर रोल भरकर भी भुगतान निकाल लिया जाता है, जिसकी शिकायतें आम हैं। सुनवाई न होने पर थका हारा मजदूर अंततः काम से विमुख होकर घर बैठ जाता है।
इसके अतिरिक्त, मनरेगा में मिलने वाली कम मजदूरी भी श्रमिकों के मोहभंग का एक प्रमुख कारण है। जहां गांव में मनरेगा के तहत प्रति दिन 270 रुपये की मजदूरी मिलती है, वहीं शहर में निजी कार्यों के लिए 450 रुपये तक की दिहाड़ी आसानी से मिल जाती है। वेतन में यह बड़ा अंतर श्रमिकों को शहर की ओर पलायन करने या मनरेगा के बजाय अन्य विकल्पों को चुनने के लिए मजबूर कर रहा है। मनरेगा योजना गांव के मजदूरों का पलायन रोकने और उन्हें कम से कम 100 दिन का काम देने की गारंटी के साथ शुरू की गई थी, लेकिन मौजूदा हालात इसके विपरीत हैं।
जिले में मनरेगा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कुल 5 लाख 26 हजार 79 श्रमिक पंजीकृत हैं। इनमें से 3 लाख 27 हजार 152 जॉबकार्ड धारकों ने काम की मांग की थी, जिसमें से 2 लाख 80 हजार 367 श्रमिक पूरी तरह से सक्रिय माने जाते हैं। विडंबना यह है कि इन सक्रिय श्रमिकों में से वर्तमान में केवल 17 से 18 हजार ही गांवों में कार्य कर रहे हैं, जो उनकी कुल संख्या का लगभग 15 प्रतिशत है। पिछले कई माह से श्रमिकों की संख्या में यह कमी लगातार दिख रही है।
इस संबंध में, उपायुक्त श्रम रोजगार, बहराइच, रविशंकर पांडेय ने स्वीकार किया कि पिछले कई महीनों से श्रमिकों की संख्या में कमी दिख रही है। उन्होंने कहा, ‘इस समय 17 से 18 हजार श्रमिक काम कर रहे हैं। काम मांगने पर उन्हें काम दिलाया जाता है। जल्द ही इसमें सुधार दिखेगा।’ हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि जब तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगती और मजदूरी दरों में सुधार नहीं होता, तब तक मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना का अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।
