बेगूसराय का उसना चावल: नेपाल-भूटान में मांग, पर किसानों को नहीं मिल रहा उचित लाभ
बेगूसराय का उसना चावल अपनी विशिष्ट गुणवत्ता के कारण न केवल देश के विभिन्न राज्यों में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों जैसे नेपाल और भूटान में भी धूम मचा रहा है। बरौनी औद्योगिक क्षेत्र में स्थित राइस मिलें हर महीने बड़ी मात्रा में चावल का उत्पादन करती हैं, जो विभिन्न देशों में निर्यात किया जाता है। इस उद्योग से हजारों परिवार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलता है।
हालांकि, इस निर्यात-उन्मुख उद्योग की चमक के पीछे किसानों की परेशानियां छिपी हुई हैं। कई मिल मालिक बताते हैं कि देवना औद्योगिक क्षेत्र में स्थापित मिलें मुख्य रूप से अरवा और उसना दोनों प्रकार के चावल का उत्पादन करती हैं। इन मिलों को आसपास के दो सौ किलोमीटर के दायरे से पर्याप्त मात्रा में धान मिल जाता है, जिससे उत्पादन वर्षभर सुचारू रहता है। कुछ मिलें सरकारी पैक्स से भी धान खरीदती हैं। अधिकारियों के अनुसार, बिहार और बंगाल जैसे राज्यों में उसना चावल की मांग काफी अधिक है और इसकी ब्रांड वैल्यू के कारण यह सामान्य चावलों से कुछ महंगा बिकता है।
इसके बावजूद, सबसे बड़ी समस्या धान खरीद की प्रक्रिया में देखी जाती है। सूत्रों के अनुसार, पैक्स स्तर पर धान खरीद में गड़बड़ी का आरोप है। सरकारी खरीद दर लगभग चौबीस सौ रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि बाजार में धान की कीमत अक्सर अठारह सौ रुपये के आसपास ही रहती है। इस अंतर के कारण किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इसके अलावा, उन्नत बीज और सिंचाई की सुविधाओं की कमी भी किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। बाजार तक सीधी और सुगम पहुंच न होने के कारण बिचौलिए मुनाफा कमा जाते हैं, जिससे किसान वंचित रह जाते हैं। यह आवश्यक है कि सरकार और संबंधित प्राधिकरण इस मुद्दे पर ध्यान दें और किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य दिलाने के लिए ठोस कदम उठाएं, ताकि इस महत्वपूर्ण कृषि-आधारित उद्योग का लाभ अंतिम उत्पादक तक पहुंच सके।
