बच्चों को ‘फेलियर’ कहने वाली बातें ले जा रही हैं सुसाइड की ओर, स्कूलों पर उठे सवाल
राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित स्कूलों में बच्चों के प्रति उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और शिक्षकों के असंवेदनशील व्यवहार के बढ़ते मामले शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। हाल ही में सेंट कोलंबस स्कूल में 10वीं कक्षा के एक छात्र द्वारा मेट्रो स्टेशन परिसर में आत्महत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना इस बात का प्रमाण है कि स्कूल, जो ज्ञान और सुरक्षा का मंदिर माने जाते हैं, कहीं न कहीं बच्चों के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल प्रदान करने में विफल साबित हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल अब केवल अकादमिक गतिविधियों के केंद्र नहीं रह गए हैं, बल्कि वे किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालने का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गए हैं। सर गंगा राम अस्पताल की वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. आरती आनंद के अनुसार, एकल परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) का प्रचलन, माता-पिता की व्यस्त जीवनशैली और स्कूलों में बार-बार होने वाली अपमानजनक स्थितियाँ किशोरों के कोमल मन पर गहरा आघात पहुँचा सकती हैं। जब बच्चों को अपनी समस्याओं का कोई समाधान नजर नहीं आता और उन्हें स्कूल में संवेदनशीलता की कमी महसूस होती है, तो वे निराशा में ऐसे गलत कदम उठाने को विवश हो जाते हैं।
वहीं, वरिष्ठ मनोचिकित्सक और आईएचबीएएस के पूर्व निदेशक डॉ. निमेश जी देसाई ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कई स्कूलों में शिक्षकों और प्रबंधन का रवैया बेहद असंवेदनशील होता जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा, ‘संयुक्त परिवार प्रणाली कमजोर हो रही है और एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है, जिससे बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा कम हो रही है। इसके अतिरिक्त, शिक्षकों द्वारा कठोर भाषा का प्रयोग और बच्चों का अपमान उनके मानसिक ढांचे को तोड़ सकता है।’ डॉ. देसाई ने यह भी कहा कि अब स्कूलों को केवल जिम्मेदार ठहराने का समय बीत चुका है; हमें तत्काल सख्त कार्रवाई और प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली के विभिन्न स्कूलों से उत्पीड़न और अपमानजनक व्यवहार के कई गंभीर मामले सामने आ चुके हैं, जो इस समस्या की भयावहता को दर्शाते हैं।
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