AI डीपफेक का कहर: पायल गेमिंग से फातिमा जटोई तक, दक्षिण एशिया के इन्फ्लुएंसर ‘AI लीक एपिडेमिक’ के जाल में फंसे
जनवरी 2026 डिजिटल दुनिया के लिए एक भयावह मोड़ साबित हुआ है। कुछ ही हफ्तों में, भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के कई प्रमुख सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों के नाम कथित तौर पर लीक हुए वीडियो और निजी सामग्री के साथ ट्रेंड करने लगे। अधिकांश मामलों में, ये वीडियो या तो AI डीपफेक थे, संपादित क्लिप थे, या लोगों को धोखा देने, बदनाम करने और ठगने के इरादे से बनाए गए फर्जी लिंक थे। इस पूरे चलन को अब ‘AI लीक एपिडेमिक’ कहा जा रहा है।
इस बार एक बड़ा अंतर यह देखने को मिला कि कुछ इन्फ्लुएंसरों ने चुप्पी साधने के बजाय खुलकर इसका सामना करने का फैसला किया। पाकिस्तान की अलीना अमीर ने स्पष्ट किया कि वह चुप नहीं रहेंगी। उन्होंने सबूतों के साथ बताया कि वायरल वीडियो AI-जनित डीपफेक है और सरकार व साइबर अपराध विभाग को टैग करते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की। इसी तरह, भारत की लोकप्रिय गेमर पायल गेमिंग के नाम से वायरल हुआ वीडियो भी फर्जी निकला। उन्होंने तुरंत FIR दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने पुष्टि की कि वीडियो नकली था और कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया गया। फातिमा जटोई ने भी एक वीडियो जारी कर स्पष्ट किया कि उनके नाम से फैलाई गई सामग्री संपादित और झूठी है।
दूसरी ओर, कुछ इन्फ्लुएंसरों ने पूरी तरह से खामोश रहने की रणनीति अपनाई। बांग्लादेश की आरोही मीम के नाम से 3 मिनट 24 सेकंड का वीडियो लिंक वायरल हुआ, जो असल में एक सट्टेबाजी और फ़िशिंग जाल था। उन्होंने इस पर कोई बयान नहीं दिया और अपने दैनिक पोस्ट जारी रखे। विशेषज्ञों के अनुसार, यह जानबूझकर किया गया ताकि फर्जी लिंक को अधिक ध्यान न मिले। इसी तरह, पाकिस्तानी जोड़े मैरी और उमैर के नाम से वायरल हुआ 7 मिनट 11 सेकंड का वीडियो एक पुराना व्लॉग निकला, जिसे गलत थंबनेल के साथ फैलाया गया था।
2026 में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब लोग इन घटनाओं को केवल एक स्कैंडल के रूप में नहीं, बल्कि साइबर अपराध के रूप में देखने लगे हैं। पायल गेमिंग और अलीना अमीर जैसे मामलों ने दिखाया है कि कानूनी कार्रवाई और सच्चाई सामने लाने से न केवल अफवाहें रुकती हैं, बल्कि दोषियों पर भी असर पड़ता है। वहीं, कुछ मामलों में चुप्पी भी प्रभावी होती है, खासकर जब लिंक पूरी तरह से फर्जी हों और एक घोटाला हो। कुल मिलाकर, यह दौर सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के लिए एक सबक है कि वे हर वायरल लिंक पर भरोसा न करें और समझें कि डिजिटल दुनिया में फैलाई जाने वाली अफवाहें भी एक तरह का अपराध हैं।
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