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एम्स भर्ती घोटाले में 20 साल बाद बरी हुआ आरोपी, Delhi Court ने CBI पर उठाए सवाल

By Jan 5, 2026

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में फर्जी नियुक्ति पत्रों के जरिए नौकरी दिलाने से जुड़े करीब दो दशक पुराने भर्ती घोटाले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी बलजीत सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया है, जिससे 20 साल से चल रही कानूनी लड़ाई का अंत हुआ। इस फैसले ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की लंबी जांच और अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, क्योंकि सीबीआई आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रही। यह मामला आम जनता के बीच सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर चर्चा का विषय बन गया है।

दो दशक पुराना है AIIMS भर्ती घोटाला
यह मामला वर्ष 2003-04 का है, जब कुछ अभ्यर्थियों को एम्स में क्लर्क ग्रेड-तीन और हॉस्पिटल अटेंडेंट के पदों पर भर्ती के नाम पर फर्जी नियुक्ति पत्र दिए गए थे। एम्स प्रशासन की शिकायत पर सीबीआई ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। इस मामले में कुल छह आरोपी थे। अदालत ने इससे पहले अवेधश कुमार दुबे को 2006 में, शंभू राय उर्फ अमित और सुरेंद्र प्रसाद शर्मा को 2016 में, तथा राजिंदर सिंह ढिल्लों को इसी वर्ष मार्च में दोषी ठहराया था। वहीं, कमल गुप्ता को 2022 में बरी कर दिया गया था। बलजीत सिंह इस मामले में बरी होने वाले दूसरे आरोपी हैं।

सीबीआई की जांच पर कोर्ट की टिप्पणी
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी की अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि सीबीआई लंबी जांच और इतने वर्षों तक चले ट्रायल के बावजूद आरोपी बलजीत सिंह की भूमिका साबित करने में पूरी तरह असफल रही। अदालत ने रेखांकित किया कि आरोपी पर जिन उम्मीदवारों के कथित इंटरव्यू लेने का आरोप लगाया गया था, उनमें से किसी भी गवाह ने कोर्ट में उसकी पहचान नहीं की। इसके अलावा, न तो आरोपी से किसी प्रकार की रकम की बरामदगी हुई और न ही ऐसा कोई दस्तावेज सामने आया, जिससे यह साबित हो सके कि वह इस AIIMS scam का हिस्सा था।

सबूतों के अभाव में बरी
कोर्ट ने यह भी बताया कि सीबीआई का मामला मुख्य रूप से एक ऐसे गवाह के बयान पर आधारित था, जिसकी ट्रायल के दौरान मृत्यु हो गई और वह अदालत में पेश नहीं हो सका। अदालत ने टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) से आरोपी के इनकार को भी दोषसिद्धि का आधार मानने से इनकार कर दिया। फैसले में अदालत ने कहा कि आरोपी करीब 20 वर्षों तक मुकदमे की मानसिक और सामाजिक पीड़ा झेलता रहा, जबकि उसके खिलाफ कोई विश्वसनीय साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं था। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने बलजीत सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया। यह फैसला न्याय प्रक्रिया में सबूतों के महत्व को फिर से स्थापित करता है।

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