आतंक को मजहबी चोला पहनाने की प्रवृत्ति से कैसे निपटेंगे?
आतंकवाद, विशेष रूप से जिहादी आतंक से प्रभावी ढंग से निपटना एक जटिल चुनौती बनी हुई है, जिसका मुख्य कारण आतंकवादियों द्वारा अपने हिंसक कृत्यों को धार्मिक जामा पहनाने की प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति न केवल उनके कृत्यों को सही ठहराने का आधार प्रदान करती है, बल्कि उन्हें व्यापक समर्थन और संरक्षण जुटाने में भी मदद करती है। दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी हमले के बाद आत्मघाती हमलावर उमर नबी के वीडियो ने एक बार फिर इस मुद्दे को उजागर किया है।
यह देखा गया है कि ऐसे हमलों के बाद, कई बार हमलावरों को ‘भटका हुआ’ या ‘गुमराह’ बताकर मामले को शांत करने का प्रयास किया जाता है। कुछ राजनेता तो उन्हें अपने मजहब का मानने से भी इनकार कर देते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि वे अपने वीडियो में अपने कृत्य को ‘इस्लामी कृत्य’ या ‘शहादत’ बताते हैं। यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है; कई आतंकी समूह अपने नामों में ‘इस्लामी’ शब्द का प्रयोग करते हैं, जैसे जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा। ये नाम ही उनकी मजहबी प्रेरणा को दर्शाते हैं, जिसका लक्ष्य अक्सर ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसा कुछ होता है।
इस्लामिक स्टेट (आईएस) जैसे संगठन, जो अपनी बर्बरता के लिए कुख्यात हैं, खुद को विशुद्ध रूप से इस्लामी बताते हैं और अपने झंडे पर शहादा अंकित करते हैं। इसके बावजूद, दुनिया भर से हजारों युवक उनके लिए लड़ने सीरिया और इराक पहुंचे। भारत में भी, कश्मीर जैसे क्षेत्रों में, आईएस जैसे संगठनों के प्रति सहानुभूति रखने वालों की संख्या देखी गई है। राजौरी में आईएस के झंडे को जलाने की घटना पर हुए बवाल ने यह स्पष्ट कर दिया कि किस हद तक मजहबी भावनाओं को चोट पहुंचाने का आरोप लगाकर हंगामा खड़ा किया जा सकता है।
यह दोहरा रवैया, जहां एक ओर आतंकी को ‘भटका हुआ’ बताया जाता है और दूसरी ओर उसके जनाजे में हजारों लोग शामिल होते हैं, जिहादी आतंक से लड़ाई को और कठिन बना देता है। यह हास्यास्पद है कि आतंकी हमलों के बाद ‘जिहाद’ की परिभाषा को ‘आंतरिक संघर्ष’ या ‘छोटे संघर्ष’ के रूप में बदलने का प्रयास किया जाता है, और ‘काफिर’ जैसे शब्दों की मनमानी व्याख्या की जाती है।
यह सच है कि ‘आतंकी का कोई मजहब नहीं होता’, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे मजहब का ही सहारा लेकर समर्थन और संरक्षण प्राप्त करते हैं। फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल के मामले में, जहां कई डॉक्टर शामिल थे, यह तर्क दिया गया कि वे सरकार की नीतियों से नाराज थे। यह तर्क कमजोर है, क्योंकि यह उनके डॉक्टर बनने या नौकरी पाने में बाधा नहीं डालता था। उनकी आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का मुख्य कारण ‘जिहाद’ के रास्ते पर चलने का जुनून था, जिसे उन्होंने मजहबी समर्थन से जोड़ लिया था। यदि वे अपनी हरकतों को मजहबी कृत्य साबित करने में सक्षम न होते, तो वे इतने लोगों को अपने साथ जोड़ने में सफल नहीं हो पाते। यह स्पष्ट है कि आतंकवाद की जड़ों में मजहबी उन्माद की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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