क्या दूसरे राज्य में बसने से बदल जाती है जाति? हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा
दिल्ली उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से एक गंभीर प्रश्न पूछा है कि क्या किसी व्यक्ति की जाति दूसरे राज्य में बसने मात्र से बदल जाती है। यह सवाल एक ऐसे मामले में उठाया गया है जहाँ एक कर्मचारी के गोंड जनजाति प्रमाण पत्र को रद्द कर दिया गया था। याचिकाकर्ता, जो मूल रूप से मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी हैं और वहीं पले-बढ़े हैं, उन्होंने बिहार में जन्म के आधार पर उनके प्रमाण पत्र को रद्द करने के फैसले को चुनौती दी है।
मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए राज्य शासन से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता विश्वनाथ साह, जिनका जन्म 1966 में जबलपुर में हुआ था, के माता-पिता बिहार के सिवान जिले से आकर मध्य प्रदेश में मजदूरी करते थे। वर्ष 1981 में तत्कालीन कलेक्टर जबलपुर द्वारा उन्हें उनकी जाति के आधार पर गोंड जनजाति का प्रमाण पत्र जारी किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने बताया कि राज्य स्तरीय उच्च-शक्ति समीक्षा समिति ने पांच अगस्त, 2025 के अपने आदेश में केवल इस आधार पर प्रमाण पत्र रद्द कर दिया कि उनके पिता का जन्म बिहार में हुआ था। याचिकाकर्ता का पूरा जीवन, शिक्षा और जन्म जबलपुर में ही हुआ है, और उन्हें दशकों पहले ही यह प्रमाण पत्र मिल चुका था।
इस मामले में अंतर-राज्यीय प्रवासियों के अधिकारों का मुद्दा भी प्रमुखता से उभरा है। याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों की उन अधिसूचनाओं और परिपत्रों की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है, जिनके अनुसार किसी अन्य राज्य में प्रवास करने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्ति को मूल राज्य के स्थान पर प्रवासी राज्य में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19(1)(ई) और 21 द्वारा प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों दोनों को नोटिस जारी कर इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह मामला उन लाखों अंतर-राज्यीय प्रवासियों के अधिकारों से जुड़ा है जो अपनी पहचान और सरकारी लाभों के लिए संघर्ष करते हैं। अदालत का फैसला इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।
