आत्मचिंतन और परमात्मा स्मरण से जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति
प्रेरक वक्ता ब्रह्मा कुमारी शिवानी ने इस बात पर जोर दिया है कि आत्मचिंतन और परमात्मा को याद करने से ही जीवन में वास्तविक सुख और शांति मिलती है। उन्होंने कहा कि ईश्वर को सदा दुखहर्ता, सुखकर्ता और रोग-शोक निवारक के रूप में जाना जाता है। वे हमें हमेशा सही राह दिखाते हैं, जिससे हम सुख-शांति पा सकें और दुख-अशांति से दूर रह सकें। ईश्वर प्रत्येक कल्प के अंत में हमें गीता का ज्ञान और राजयोग की शिक्षा देकर हमारे परम शिक्षक के रूप में हमारे दैवी गुणों का विकास करते हैं।
शिवानी ने समझाया कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और भाग्य से प्राप्त होता है। हमारा भाग्य हमारे पुरुषार्थ और ईश्वर की कृपा के मेल से बनता है। अच्छे कर्म और उनसे मिलने वाले अच्छे फल को ही कृपा कहा जाता है। हमारे अच्छे कर्मों के पीछे हमारे अच्छे संकल्प, सोच-विचार, वृत्ति, दृष्टिकोण, वाणी और विश्वास का होना आवश्यक है। इन्हीं के अनुरूप हमारी प्रवृत्ति, आदतें, चरित्र, संस्कार, संसार और भाग्य का निर्माण होता है।
इसलिए, हमें कभी भी ईश्वर या उन लोगों को दोष नहीं देना चाहिए, जिनके बारे में हमें लगता है कि उन्होंने हमारा भाग्य बिगाड़ा है। हमारे कर्म ही हमारे भाग्य के निर्माता और विनाशक हैं, और इसके लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं। ईश्वर को हमेशा भाग्यविधाता कहा जाता है, भाग्यभंजक नहीं। वे हमें सदा अच्छे कर्म करने की प्रेरणा, अच्छी शिक्षा और संस्कार देते हैं, तथा अच्छा भाग्य बनाने के लिए मार्गदर्शन करते हैं।
ईश्वर हमें यह ज्ञान देते हैं कि हम सभी मनुष्य एक परमपिता परमात्मा की संतान हैं। हम सब भाई-भाई हैं और एक विश्व परिवार के सदस्य हैं। हम अपने मूल घर, परमधाम के निवासी हैं, जहां से हम अपनी भूमिका निभाने के लिए इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आते हैं। हम सभी मूल रूप से एक ही आत्मा हैं, जो दिव्य ज्योति बिंदु स्वरूप है।
आत्मा-परमात्मा के ज्ञान पर आधारित आत्मचिंतन और परमात्मा के स्मरण से हमें सुख, शांति, प्रेम और आनंद का अनुभव होता है। इसके विपरीत, देहाभिमान और सांसारिक चिंताएं हमारे अंदर दुख, द्वेष, भय, अशांति, तनाव और विकार उत्पन्न करती हैं, जो हमें लंबे समय तक दुखी, रोगी और शक्तिहीन बनाए रखती हैं।
अपने जीवन, समाज और संसार को मूल्यनिष्ठ, शक्तिशाली, सुखमय और समृद्धिशाली बनाने के लिए, हमें सदा आत्माभिमानी बनकर परमात्मा की शरण में रहना चाहिए। हर कर्म को ईश्वर के लिए करना चाहिए। यदि हमारे अंदर कोई मनोविकार, अवगुण या व्यसन का बंधन है, तो उसे मन-बुद्धि से ईश्वर को सौंप देना चाहिए। इससे हम सभी प्रकार के विकारों के बोझ से मुक्त हो सकते हैं और दूसरों को भी नकारात्मकता से मुक्त करने में सहायक बन सकते हैं।
कई बार हम अपने मन के बोझ को ईश्वर को सौंपना चाहते हैं, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी के कारण ऐसा नहीं कर पाते। कोई भी पुरानी आदत या संस्कार तभी छूटता है जब हम उसे छोड़ने का निश्चय करते हैं। व्यसन या बुरी आदतों को छोड़ने का सबसे बड़ा साधन हमारी दृढ़ संकल्प शक्ति है। कई बार हम दृढ़ संकल्प तो करते हैं, लेकिन उसे दोहराते नहीं हैं।
दोहराने के साथ-साथ हमें उस भावना को महसूस भी करना चाहिए। ईश्वरीय ज्ञान और ध्यान का नियमित अभ्यास, तथा परमात्म शक्ति का अनुभव हमें व्यर्थ की बातें, बुरी आदतें, सांसारिक बोझ और कर्म बंधनों से मुक्त कर सकता है। चाहे हमें किसी भी प्रकार का बंधन हो, हमें अपना सर्व संबंध एक परमात्मा के साथ जोड़ना चाहिए और सभी मायावी बंधनों से मुक्त रहना चाहिए।
