मताधिकार से वंचित करना दोयम दर्जे का नागरिक बनाने जैसा : सुप्रीम कोर्ट | supreme court news
भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज ने एक बेहद अहम टिप्पणी की है। हैदराबाद के एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जस्टिस उज्जवल भुइयां ने कहा कि नागरिकता और वोट देने का अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हें कभी भी अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करना शरीर से आत्मा को बाहर निकालने जैसा है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान नागरिकों के बीच कोई भेद नहीं करता। यदि कोई प्रशासनिक प्रक्रिया या नियम बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करता है, तो इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 326 और समानता के अधिकार यानी अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। ऐसी मनमानी प्रक्रिया देश की मूल संवैधानिक भावना पर सीधा प्रहार करती है।
डॉ. बीआर आंबेडकर के ऐतिहासिक भाषणों का स्मरण करते हुए उन्होंने बताया कि वयस्क मताधिकार को संसदीय कानूनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि इसे संविधान में ही संरक्षित किया जाना चाहिए। यह अधिकार देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिए गए अनगिनत बलिदानों और संघर्षों का परिणाम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के सख्त बयानों से चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा को लेकर बहस और तेज होगी। अदालत की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक प्रणाली की रीढ़ को मजबूत करने का काम करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि हर नागरिक की आवाज शासन व्यवस्था में बनी रहे।
