आगरा की ऐतिहासिक रामलीला का 10 हजार से करोड़ों तक का सफर | agra news
उत्तर भारत के सांस्कृतिक पटल पर अपनी अनूठी पहचान रखने वाला आगरा का श्रीरामलीला महोत्सव किसी एक व्यक्ति या संस्था का नहीं, बल्कि आम जनमानस की अटूट आस्था का प्रतीक है। वर्ष 1885 में रावतपाड़ा के प्रतिष्ठित नागरिकों ने मिलकर इस परंपरा की नींव रखी थी। शुरुआती दौर में सीमित संसाधनों और आपसी चंदे से लीलाओं का मंचन होता था, जहां जरूरत पड़ने पर संरक्षक अपनी जेब से धन खर्च करते थे। समय के पहिये के साथ इस आयोजन ने विराट रूप ले लिया और यह शहर की सांस्कृतिक पहचान बन गया।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के पन्नों को पलटें तो वर्ष 1940 में रामलीला मंचन, राम बरात और जनकपुरी जैसे मुख्य आयोजनों का कुल वार्षिक बजट करीब 10 हजार रुपये हुआ करता था। उस दौर में आतिशबाजी और अखाड़ों पर कुछ सौ रुपये ही खर्च होते थे। सत्तर के दशक तक पहुंचते-पहुंचते बकाये और संसाधनों का विस्तार हुआ, जिसके तहत 75 हजार रुपये की लागत से भगवान विष्णु के लिए एक विशेष रजत रथ तैयार कराया गया था। जनहित और सांस्कृतिक जुड़ाव का यह अनूठा सफर आज करोड़ों रुपये के बजट वाले भव्य उत्सव में तब्दील हो चुका है।
वर्तमान समय में इस विशाल आयोजन के मुख्य खर्चों में आधुनिक प्रकाश व्यवस्था, भव्य झांकियां, कलाकारों के मानदेय, तकनीकी संसाधन और जनकपुरी की सजावट शामिल हैं। महंगाई और आधुनिकता के दौर में भले ही खर्च का आंकड़ा आसमान छू रहा हो, लेकिन इसका मूल आधार आज भी जनसहयोग और स्थानीय लोगों की आस्था ही है। इस सांस्कृतिक महाकुंभ के निरंतर विस्तार ने न केवल स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा दिया है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उनकी समृद्ध विरासत से भी जोड़े रखा है।
