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बंगाल-तमिलनाडु में ‘दीदी-भैया’ हाशिए पर, केशव का अखिलेश पर तीखा राजनीतिक हमला

By May 4, 2026

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव पर अब तक का सबसे तीखा राजनीतिक हमला बोला है। उन्होंने न केवल अखिलेश यादव के राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठाए, बल्कि ‘इंडिया’ गठबंधन के प्रमुख चेहरों—ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन को भी निशाने पर लिया है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के रुझानों में इन नेताओं की हार स्पष्ट दिख रही है।

मौर्य ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर ट्वीट करते हुए कहा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव को अब उत्तर प्रदेश की जनता सुनने को तैयार नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिन ‘दीदी’ (ममता बनर्जी) और ‘भैया’ (एम.के. स्टालिन) के सहारे अखिलेश अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे थे, देश की जनता ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया है।

उन्होंने आगे लिखा, “अखिलेश यादव के ‘भैया’ राहुल गांधी का हाल तो पूरा देश पहले ही देख चुका है। हाल ही में बिहार में तेजस्वी यादव भी ‘चारों खाने चित्त’ हो चुके हैं। ऐसे में अखिलेश का इन नेताओं के साथ गठबंधन केवल डूबती कश्ती का सहारा है।”

केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव को नसीहत देते हुए कहा कि उन्हें अब 2027 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी के मुंगेरीलाल के सपने देखना छोड़ देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व और डबल इंजन सरकार के विकास कार्यों के सामने विपक्ष की नकारात्मक राजनीति पूरी तरह विफल हो चुकी है।

मौर्य ने ‘सपा बहादुर’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा, “सच तो यह है कि मोदी जी के नेतृत्व में अब सपा के हिस्से में केवल ‘अंतहीन इंतजार’ ही लिखा है। जनता का विश्वास अब सिर्फ और सिर्फ भाजपा के साथ है।”

यह बयान ऐसे समय में आया है जब सपा ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के साथ 2027 की तैयारी का दावा कर रही है। मौर्य का यह हमला स्पष्ट करता है कि भाजपा सपा के राष्ट्रीय स्तर के गठबंधनों की विफलता को जनता के बीच मुद्दा बनाएगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केशव मौर्य ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अखिलेश यादव के सहयोगी दल उन्हें चुनावी वैतरणी पार कराने में अब सक्षम नहीं हैं। इस तरह के राजनीतिक वार-पलटवार से उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी चुनावों को लेकर सरगर्मी बढ़ गई है, जिसका सीधा असर जनता के मूड पर पड़ सकता है।

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