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NIT जमशेदपुर का रोबोटिक फार्मूला अंतरिक्ष मिशनों को देगा नई उड़ान

By Nov 29, 2025

अंतरिक्ष में भारत की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को पंख लगने वाले हैं। एनआईटी जमशेदपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के होनहार छात्रों ने एक ऐसा रोबोटिक फार्मूला तैयार किया है, जो भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों, खासकर स्पेस स्टेशन पर सर्विसिंग और फ्यूलिंग जैसे जटिल कार्यों को बेहद आसान बना देगा। यह आविष्कार न केवल अंतरिक्ष अनुसंधान को गति देगा, बल्कि भारत को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण का अभाव रोबोटिक कार्यों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है। धरती पर जहां मशीनों को स्थिर आधार मिलता है, वहीं अंतरिक्ष में न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार, जब कोई रोबोटिक हाथ किसी दिशा में बल लगाता है, तो अंतरिक्ष यान विपरीत दिशा में हिलने लगता है। इस ‘बेस डिस्टर्बेंस’ को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन होता है।

एनआईटी के छात्रों ने इस समस्या का समाधान ‘जेनेटिक एल्गोरिदम’ (GA) के रूप में खोजा है। प्रकृति में पीढ़ियों के साथ आने वाले सुधार की तरह, यह सिस्टम खुद सीखकर अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाता है। इन स्मार्ट एल्गोरिदम की मदद से रोबोटिक हाथ यह समझ पाते हैं कि किस रास्ते, किस गति और किस दिशा में चलते हुए वे अपने लक्ष्य तक पहुंचें, ताकि स्पेसक्राफ्ट के संतुलन पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। शोधकर्ताओं ने पाया कि यह नई तकनीक पारंपरिक PID सिस्टम की तुलना में कहीं अधिक स्थिर और ऊर्जा-कुशल है।

भारत आने वाले वर्षों में अपना स्वयं का स्पेस स्टेशन स्थापित करने, पुराने उपग्रहों की कक्षा में मरम्मत करने और स्पेस-सेवा मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम देने की योजना बना रहा है। ऐसे मिशनों में अक्सर दो या अधिक रोबोटिक हाथों को एक साथ मिलकर बेहद जटिल कार्य करने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए, एक हाथ सैटेलाइट का नट खोल सकता है, दूसरा पुर्जा बदल सकता है, और तीसरा ईंधन टैंक में नोजल फिट कर सकता है। एनआईटी की नई तकनीक, जिसे ‘को-ऑपरेटिव रिडंडेंट स्पेस मैनिपुलेटर्स’ (सहयोगी बहु-हाथ रोबोट सिस्टम) के नियंत्रण के लिए विशेष रूप से उपयोगी बताया गया है, इन संयुक्त कार्यों को सुरक्षित और तीव्र बनाएगी।

इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जब रोबोटिक हाथ की हलचल से यान विचलित नहीं होगा, तो उसे स्वयं को स्थिर करने के लिए बार-बार थ्रस्टर्स का उपयोग नहीं करना पड़ेगा। इससे मिशन के ईंधन की बचत होगी, यान की आयु बढ़ेगी, मिशन की लागत कम होगी और जोखिमों में भारी कमी आएगी। इस नवोन्मेषी तकनीक का उपयोग अंतरिक्ष में बड़े ढांचे को जोड़ने (असेंबली), स्वचालित अंतरिक्ष मिशनों (ऑटोनॉमस ऑपरेशंस), पुराने उपग्रहों में दोबारा ईंधन भरने और अन्य जटिल मरम्मत अभियानों में किया जा सकता है। यह आविष्कार निश्चित रूप से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।

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